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विनिवर्तना से संवर व पूर्व कर्मों का हो सकता है निर्जरण : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण विनिवर्तना से संवर व पूर्व कर्मों का हो सकता है निर्जरण : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण विनिवर्तना से संवर व पूर्व कर्मों का हो सकता है निर्जरण : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
गुरुवाणी/ केन्द्र India Rajasthan

विनिवर्तना से संवर व पूर्व कर्मों का हो सकता है निर्जरण : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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Sanjay Vaidmehta

24/09/2026 07:24 PM

विनिवर्तना से संवर व पूर्व कर्मों का हो सकता है निर्जरण : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

-आचार्यश्री ने आज के निर्धारित विषय को किया व्याख्यायित

-भाद्रव शुक्ला द्वादशी को पूज्यप्रवर पहुंचेंगे डालगणी के समाधि स्थल

21.09.2026, सोमवार, लाडनूं :

    जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ सोमवारसोमवारकेसोमवारसोमवारकेकेसोमवारसोमवारकेसोमवारसोमवारकेकेकेके वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘विनिवर्तना से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि हम सभी पंचेन्द्रिय प्राणी हैं। पांच ज्ञानेन्द्रियां होती हैं और पांच कर्मेन्द्रियां भी होती हैं। मन, वचन, काय- ये तीन योग भी होते हैं। हमारा जीवन मुख्यतया दो तत्त्वों का संयोग है- आत्मा और शरीर। शेष जो भी है, संभवतः इन्हीं का विस्तार है। मनुष्य के भीतर अनंतकाल से संस्कारों का प्रवाह चल रहा है। कार्मण शरीर तो संस्कारों का भण्डार है। वहां संस्कार एकत्रित होते हैं और वहां से जीवन का संचालन भी होता है। यदि इस शरीर का बस मान लिया जाए तो इसका ड्राइवर तो कार्मण शरीर ही होता है।

    जीव की चेतना पर कर्म का प्रभाव भी होता है। कर्म के प्रभुत्व को कैसे क्षीण किया जाए। चेतना को कर्मों की जकड़न से छुड़ाकर स्वतंत्र बनाने का प्रयास होना चाहिए। मोहनीय कर्म की परतंत्रता से अपनी चेतना को मुक्त कराने का प्रयास करना चाहिए। शरीर के साथ कार्मण शरीर का जुड़ाव अनादिकाल से है। मोक्ष की स्थिति को प्राप्त करने वाली आत्मा इस कार्मण शरीर से मुक्त हो सकती है।

    आदमी अपनी इन्द्रियों को मन, वचन काय को प्रमाद की ओर बढ़ने से रोकने का प्रयास करना चाहिए। जहां कहीं भी लगे कि शरीर, वाणी अथवा मन से कहीं कोई सावद्य कार्य में जाने लग जाए तो उसे वहां से लौटने का प्रयास करना चाहिए। यह विनिवर्तना होती है। अपनी मन को किसी प्रमाद से बचा लेना, लौटा लेना विनिवर्तना होती है। जैसे छोटे बच्चा यदि अग्नि की ओर बढ़ता है तो उसके माता-पिता उससे वहां से लौटा लेते हैं। वैसे ही आदमी हो अथवा साधु, यदि उसके शरीर, मन, वचन और काया प्रमाद की ओर बढ़े तो उसे वहां से लौटाने का प्रयास करना चाहिए। प्रमाद से आपने आपको दूर रखने से अर्थात् विनिवर्तना से संवर की प्राप्ति हो सकती है तथा पूर्व कर्मों का निर्जरण भी हो सकता है। विनिवर्तना रखना भी एक प्रकार की साधना है। इस प्रकार आदमी को संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। इस विनिवर्तना से स्वयं पर नियंत्रण रखने और बुरे कार्यों से बचने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार आदमी को अपनी चेतना को जागृत बनाने और गलत कार्यों से बचाने का प्रयास करना चाहिए। अपनी गलत वृत्तियों पर नियंत्रण रखने का प्रयास करना चाहिए।

    आचार्यश्री ने आगे कहा कि भाद्रव शुक्ला द्वादशी को संभव हुआ तो डालगणीजी के समाधि स्थल पर जाने का विचार है। मूल का ठिकाणा, सेवा मंदिर होकर पुनः जैन विश्व भारती में लौटने का विचार है।