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सेवा लेने से अधिक सेवा देने का हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण सेवा लेने से अधिक सेवा देने का हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण सेवा लेने से अधिक सेवा देने का हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण सेवा लेने से अधिक सेवा देने का हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण सेवा लेने से अधिक सेवा देने का हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
गुरुवाणी/ केन्द्र India

सेवा लेने से अधिक सेवा देने का हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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Sanjay Vaidmehta

24/09/2026 07:15 PM

सेवा लेने से अधिक सेवा देने का हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

-शांतिदूत की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के राष्ट्रीय अधिवेशन का शुभारम्भ

-अभातेमम ने श्रीमती कनक बरमेचा को प्रदान किया वर्ष 2026 का श्राविका गौरव अलंकरण

-आचार्यश्री ने प्रदान किया मंगल आशीर्वाद, साध्वीप्रमुखाजी का भी हुआ उद्बोधन

22.09.2026, मंगलवाार, लार, लाडलाडनूंनूं :

    जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की मंगल प्रेरणा प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘सम्भोज-प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि सम्भोज-प्रत्याख्यान से जीव क्या प्राप्त करता है? उत्तर प्रदान करते हुए बताया गया है कि साधु समुदाय अनेक व्यक्तियों का समूह होता है। अकेले साधना करने वाले भी प्राचीनकाल में सम्मत रहे हैं। वर्तमान में तेरापंथ की परंपरा में सामुदायिक साधना का उपक्रम चलता है। एकाकी साधना वर्तमान में प्रायः सम्मत नहीं है। संघीय साधना एक साथ भोजन की बात भी होती है। सम्भोज अर्थात् मण्डली भोज की बात भी होती है। साधु हो अथवा साध्वी सभी साथ में भोजन करते हैं, आहार करते हैं। वर्तमान में भी यह क्रम चल रहा है। इस बार साधु-साध्वियों की विराट उपस्थिति जैन विश्व भारती में हो रही है।

    साथ में आहार करना, साथ में अध्ययन के लिए कक्षा में बैठना, साथ में आहार करना, प्रतिक्रमण, अध्ययन आदि किया जा सकता है। चितारना आदि भी सामूहिक रूप में हो सकता है। सामूहिक जीवन में थोड़ा सहन करने का भी प्रयास भी होना चाहिए। अनुकूलता आदि भी देखी जा सकती है। आगे की साधना करनी है तो साधु को अकेले में ही आहार करना चाहिए। स्वयं गोचरी लाना और स्वयं अकेले में भोजन करना यह स्वालम्बन की साधना हो सकती है। स्वयं का वस्त्र धोने से लेकर, पात्री साफ करना, पानी लाना, गोचरी लाना और स्वयं अकेले गोचरी करना भी एक प्रकार की साधना है।

    आदमी को स्वालम्बन का प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए। अपना वस्त्र प्रक्षालन, प्रतिलेखन का कार्य स्वयं से ही करना, अच्छी बात हो सकती है। सामूहिक जीवन में परस्पर सहयोग की बात होती है। परस्पर सहयोग की भावना से सिंघाड़े आदि की व्यवस्था भी अच्छी रह सकती है। वृद्धों को अच्छे मान-सम्मान, सेवा की भावना से छोटे सेवा दें तो वहीं बड़े और वृद्ध भी अपने से छोटे साधु-साध्वियों को प्रेम, स्नेह व सौहार्द भाव से रखें तो बहुत अच्छी व्यवस्था चल सकती है। यह पारस्परिक सहयोग की बात बहुत अच्छी हो सकती है। सेवा लेना ही नहीं, जितनी सेवा दी जा सके, वह भी करने का प्रयास करना चाहिए।

    जितना संभव हो सके, सहयोग देने का प्रयास करना चाहिए। स्वालम्बन के साथ-साथ सहयोग व सेवा की भावना रखने का प्रयास होना चाहिए। साधना की दृष्टि यदि कोई मण्डली भोज का त्याग करता है तो उससे परावलम्बन छूटता है और स्वावलम्बन का विकास होता है तथा वह समता में भी रह सकता है। जो निरालम्बन साधु होता है, वह मोक्ष की साधना में ज्यादा प्रवृत्त हो सकता है। संतोष की भावना का भी जागरण हो सकता है। कम से कम सेवा लेने और अधिक से अधिक सेवा देने का प्रयास होना चाहिए। प्रेक्षा विश्व भारती में दीक्षित साधु-साध्वियों के दीक्षा के एक वर्ष पूर्ण हो गया है। परसो दीक्षित हुए साधु-साध्वियों का सहयोग-सेवा करने का प्रयास करना चाहिए।  

    आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के 51वां राष्ट्रीय अधिवेशन ‘संवाद’ का आज मंचीय उपक्रम रहा। इस संदर्भ में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सुमन नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। इस दौरान अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल द्वारा श्रीमती कनक बरमेचा को वर्ष 2026 का ‘श्राविका गौरव’ अलंकरण प्रदान किया गया। उनके प्रशस्ति पत्र का वाचन अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की उपाध्यक्ष श्रीमती नीतू ओस्तवाल ने किया। श्रीमती बरमेचा ने अपनी हर्षाभिव्यक्ति दी। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन शासन में चार तीर्थ है- साधु, साध्वी, श्रावक व श्राविका। यह चौथा तीर्थ है। श्रावक-श्राविकाएं भी एक रत्नों की माला के समान होती हैं। सेवा के क्षेत्र में इनका बहुत अच्छा विकास हुआ है और भी अच्छा विकास हो सकता है। इस कार्यक्रम का संयोजन श्रीमती सुनीता जैन ने किया।