– लगभग 13 कि.मी. का विहार कर आडेसर पहुंचे युगप्रधान आचार्यश्री
– सेवा साधक श्रेणी को प्राप्त हुआ मंगल आशीष
2 मार्च, 2025, बुधवार, आडेसर, कच्छ (गुजरात)।
लगभग ढाई महीनों से अधिक समय तक कच्छ जिले की सीमा में विहार व प्रवास करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अब कच्छ की सीमा से बाहर पधारने वाले हैं, किन्तु अभी तक आचार्यश्री का विहार व प्रवास कच्छ जिले की सीमा में ही हो रहा है। इस लम्बे विहार व प्रवास काल में कच्छ जिले को आचार्यश्री ने आध्यात्मिकता की गंगा से ऐसा अभिसिंचन प्रदान किया है कि यह कच्छ की भूमि सदियों तक उससे ऊर्जा प्राप्त करती रहेगी। आचार्यश्री कच्छ जिले में स्थित भुज में तेरापंथ धर्मसंघ का 161वां तथा गुजरात राज्य का पहला मर्यादा महोत्सव किया। इसके अलावा इस कच्छ जिले में वर्धमान महोत्सव के साथ अनेकानेक सम्मेलनों आदि से कच्छ जिले को भावित किया है।
बुधवार को प्रातःकाल शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मोडा से मंगल प्रस्थान किया। जन-जन को आशीष प्रदान करते हुए शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ लगभग 13 किलोमीटर का विहार कर आडेसर में स्थित श्री आडेसरकुमार प्राथमिक ग्रुपशाला में पधारे।
ग्रुपशाला परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालु जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जीवन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। आज गांवों में, कस्बों में, नगरों-महानगरों में शिक्षालय मिलते हैं। कहीं प्राथमिक शाला, कहीं उच्च विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि बने हुए होते हैं। जहां शिक्षक ज्ञान प्रदान करते हैं और विद्यार्थी ज्ञान ग्रहण करते हैं। शास्त्र में कहा गया है कि सदा स्वाध्याय में रत रहो। ज्ञान दो प्रकार के हो सकते हैं-एक अध्यात्म विद्या का ज्ञान और एक लौकिक विद्या का ज्ञान।
विभिन्न विषयों और भाषाओं से संबंधित ज्ञान को लौकिक ज्ञान मान लें और अध्यात्म, धर्म, संस्कार आदि से संदर्भित ज्ञान आध्यात्मिक विद्या कहे जाते हैं। जीवन में लौकिक ज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान भी आवश्यक है। आदमी को अपने अज्ञान को पहचान कर ज्ञान के अर्जन का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। दुनिया में अलग-अलग विद्याओं के विशेषज्ञ लोग मिल सकते हैं। आदमी को अपनी अज्ञानता को दूर कर ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अध्यात्म विद्या का भी ज्ञान करने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान के अधिक विकास के लिए स्वाध्याय होना आवश्यक है। जीवन में जितना अधिक स्वाध्याय होगा, अज्ञानता कम होती जाएगी और ज्ञान का प्रकाश प्रसारित होता चला जाएगा। इसलिए आदमी को ज्ञानार्जन के विकास के लिए निरंतर स्वाध्याय करते रहने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने सेवा साधक श्रेणी के संदर्भ में प्रेरणा देते हुए कहा कि सेवा के साथ साधना को ही अपना आभूषण बनाने का प्रयास करें। इस श्रेणी के लोगों को सेवा और साधना का विकास करते रहने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में ज्ञान और साधना का अच्छा विकास होता रहे। ग्रुपशाला के प्रिंसिपल श्री महेन्द्र भाई ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
