– 15 दिनों तक अध्यात्म की गंगा प्रवाहित कर गांधीधाम से गतिमान हुए ज्योतिचरण
– पाइन इण्डिया का परिसर पूज्यचरणों से बना पावन
– श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य की अभिवंदना में दी प्रस्तुति
20 मार्च, 2025, गुरुवार, पडाना, कच्छ (गुजरात)।
भारत के पश्चिम छोर पर खारे समुद्र तट पर स्थित गांधीधाम में पन्द्रह दिनों तक अध्यात्म की अमृतमयी गंगा का प्रवाह करने के उपरांत जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गांधीधाम के रिवेरा से मंगल प्रस्थान किया। अपने आराध्य की महती कृपा से आप्लावित गांधीधामवासियों ने अपने आराध्य के प्रति अपने कृतज्ञ भाव अर्पित किए। सभी पर मंगल आशीष की वृष्टि करते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल सेना संग अपने चरण गतिमान किए।
आचार्यश्री लगभग 11 कि.मी. का विहार कर पडाना में स्थित पाइन इण्डिया के परिसर में पधारे। प्रतिष्ठान से संबंधित लोगों ने आचार्यश्री का भावभीना स्वागत किया।
इस परिसर में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि जैन धर्म एक ऐसा धर्म है, जहां नौ तत्त्वों की बात है, अहिंसा की बात है और समता की बात भी है। अध्यात्म की साधना का मानों एक प्राणतत्त्व समता की साधना है। विशेष प्रसन्नता को प्राप्त करने के लिए समता की साधना भी अपेक्षित है, क्योंकि परिस्थितिजन्य जो खुशी होती है, वह कभी जा भी सकती है। जो प्रसन्नता परिस्थिति निरपेक्ष होती है, आत्मा और समता से उत्पन्न होने वाली होती है, वह प्रसन्नता व सुख स्थाई हो सकता है। परिस्थिति को एक जैसा हमेशा बनाए रखना हमारे हाथ की बात न भी हो, किन्तु समता आदमी के अपने हाथ में होती है। कहा गया है कि स्ववश में समस्त सुख और परवश में कोई सुख नहीं है। परवशता दुःख होती है।
स्थूल दृष्टि से देखा जाए तो उदाहरण स्वरूप मानों किसी को लकवा मार गया हो, वह अपने से चलना-फिरना, खाना-पीना नहीं कर पाता तो कोई उसको खिलाए तो वह खा सकता है अन्यथा वह भूखा भी रह सकता है। इस प्रकार परवशता हो गई, यह दुःख की बात हो गई। जो आदमी अपना कार्य स्वयं कर सके, वह सुख की बात हो सकती है। अपनी शक्ति होती है तो आदमी अपना कोई भी कार्य कर सकता है। शरीर सक्षम है तो साधु भी अप्रमत्त रूप में अपना बोझ लेकर चल सकता है। आचार्यश्री भिक्षु स्वामी पहले अपना बोझ स्वयं लेकर चला करते थे। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की दृष्टि का ध्यान रखा जा सकता है।
आदमी को स्वावलम्बी बनने का प्रयास करना चाहिए। आदमी की मनोवृत्ति परवशता वाली नहीं होनी चाहिए। आदमी को तो दो हाथ और दो पैर के रूप में मानों चार नौकर अथवा सहवर्ती प्राप्त हैं तो भला दूसरों का इंतजार कैसा। आदमी को अपना कार्य स्वयं करने का प्रयास करना चाहिए। अवांछनीय रूप में अविलंबित बनने से बचने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी प्रयास करे कि परिस्थिति को अपने अनुकूल कर ले, किन्तु जब संभव न हो तो आदमी को परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने का प्रयास करना चाहिए। स्ववशता होती है तो सुख की प्राप्ति संभव है। जीवन में परिस्थितियां अनुकूल हों अथवा प्रतिकूल, प्रत्येक परिस्थिति में समता भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। सूर्य समता का सबसे बड़ा उदाहरण है। महान पुरुष वही होता है जो संपत्ति और विपत्ति दोनों में एक जैसे रहता है। इस प्रकार समता की साधना कर अपने आपको विशेष प्रसन्न बनाने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरांत साध्वीप्रमुखाश्री विश्रुतविभा जी ने भी समुपस्थित जनता को उद्बोधित किया।
आचार्यश्री के स्वागत में श्री कमल सुराणा, श्री सिद्धार्थ सुराणा ने अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी। सुराणा परिवार की महिलाओं ने स्वागत गीत का संगान किया। वाव की श्रीमती रोपलबेन ने अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति देते हुए वाव की ओर से आराध्यम का थीम सांग आचार्यश्री के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। वाव पथक के संयोज श्री विनीतभाई संघवी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने वाववासियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
